Thursday, December 15, 2016

तुम होठों से बिखरा देना

तुम होठों से बिखरा देना
रंग हँसी के, खिले खिले
मैं पलकों से समेट उसे
रंग लूँगा अपने ख्वाब सभी

तुम ऊँगली से लिखते जाना
मेरी पीठ पे नाम मेरा
मुझको मेरे सवालों के
मिल जायेंगे जवाब सभी

तुम थोडा सा देख के फिर
अनदेखा कर देना मुझे
मैं भी हटा के देखूँगा
अपने चेहरे से नकाब सभी

- 15-12-2016

Monday, November 14, 2016

माना मैं भूल चला था लेकिन

माना मैं भूल चला था लेकिन
तुम तो याद दिलाते
आँखों के दरवाज़े बन्द मिले थे
तो दिल से चले आते

तुम्हीं बताते कितना मुश्किल
मुझ बिन जीना हो चला
मेरे साथ के बिन तुमसे अब
ना जीना जीने से भला
मैं कहता तुम ना कहते पर
इशारों से ही बुलाते
आँखों के दरवाज़े बन्द मिले थे
तो दिल से चले आते

मैं क्यों मान के बैठा हूँ कि
तुम मन की मन में रखोगे
जो मैं चुप बैठा तो तुम भी
मुझसे दिल की ना कहोगे
दस्तूर ये है कि मैं कहूँ तो
तुम रिवाज झुठलाते
आँखों के दरवाज़े बन्द मिले थे
तो दिल से चले आते
- 16 July 2016

मैं बहुत देर तक

मैं बहुत देर तक
खड़ा रहा उसी जगह
देखता रहा तुम्हें
जाते हुए
जब तक यक़ीन नहीं हो गया
कि तुम सच में
दूर हो गयी हो उतनी
कि आवाज़ नहीं पहुँच सकती
और नज़र में धूल के ग़ुबार
धुँधला करते गए
जो कुछ भी दिख रहा था

मैं रोज़ आता रहा वहाँ
ये देखने कि तुम लौटी हो शायद
नया शहर शायद रास ना आया हो तुम्हें
पर ख़ाली थी राहें और दूर दूर तक
कोई निशान नहीं था
तुम्हारे लौटने का

और फिर एक दिन तुम्हें देखा
हँसी का एक सुर्ख़ रंग पहने
चेहरे पर ख़ुशी की लाली सजाए
जैसे तुमसे कुछ बिछड़ा ही नहीं
जैसे तुमने कुछ खोया ही नहीं
तुम लौटी थी उसी शहर
पर किसी नए रास्ते से

- १ सितम्बर २०१६

मैंने और तुमने...

मैंने खामोशी से लिख के
कोरे पन्ने भेजे थे
तुमने बोलों की स्याही से
संशोधन कर डाले हैं

मैंने बहुत करीने से
रात की चादर मोड़ी थी
तुमने झाड़ के तारे सारे
तितर बितर कर डाले हैं

मैंने धूप के टुकड़ों से
अंधेरो को सजाया था
तुमने रोशनदानो के
पल्ले बंद कर डाले हैं

पर फिर भी रिश्ता है तुमसे
शिकवों के रंगों से रंगा
तुमसे मेरी तन्हाई में
नज्मों के ये उजाले हैं.

- 14th November 2016

Thursday, June 9, 2016

ख्वाबों से यारी हुई तो

ख्वाबों से यारी हुई तो
नींदे रूठ गयी हैं
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है

पहले नींद नहीं आई
कि कल क्या होगा जाने
फिर सोना चाहा तो
सपने आ बैठे सिरहाने
दबे पाँव आके सच्चाई
उम्मीदें लूट गयी है 
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है 

पहले रिश्तों फिर किश्तों
की खातिर दौड़े भागे
दिन दिन भर मीलों चले
कितनी रातों जागे
वादे निभाये औरों से 
खुद को दी कसमें टूट गयी हैं 
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है

Manasvi
25th May 2016

तुम मेरी आँखों पे रख दो

तुम मेरी आँखों पे रख दो
थोड़ी आँच हथेली की
मैं भी सपने जला के देखूँ
कितना रंग बदलता है

क्या फिर मन उन्ही अरमानों की
राह में खोना चाहेगा?
फिर माँगेगा दुआ वही,
उसी चाँद के पीछे भागेगा?
क्या उसी झूठे वादे से
अब भी ये बहलता है?

हो सकता है कुछ ना बदले
सपना झुलसे पर रहे वही
आँसू बन थोड़ा सा पसीजे
पर आँखों से बहे नही
कब किस साँचे में ढल जाए
सपना रोज़ पिघलता है

- मनस्वी
25 april 2016

पहचान हो नयी

पहचान हो नयी
पर शोहरत वही मिले
दस्तखत वही रहें
पर नाम बदल जाए

कुछ अजनबी भी हों
कुछ अपने साथ रहें
बेमानी बातों में
कई शाम निकल जाए

पता नया भले हो
पर डाकिया पुराना
जो मेरे नाम ख़त हो
मुझ तक पहुँच जाए

शर्तों के साथ माँगी
पर फिर भी ख्वाहिशें हैं
जो थोड़ा लड़खड़ाउं
तो वक़्त सम्हल जाए

- Manasvi 18th March 2016

एक बादल

बस यूँ ही बरस के गुज़र गया
एक बादल इधर से किधर गया

दो बूँदें जाने कहाँ गिरी?
जाने किस मिटटी की बांछें खिली?
जाने किस दिल की प्यास बुझी?
बिन मौसम देखो आया वो
जो वादा कर के था मुकर गया

तुम लौट के आखिर आये क्यों?
क्या अपना कुछ यहाँ भूले हो?
या भटके हो किसी राही सा?
कुछ भी हो, हम तो खुश हैं कि
एक पल सुबह का संवर गया

- Manasvi 4th March 2016 (It rained today)

चलो एक वादा कर लें...

चलो एक वादा कर लें...

मैं जहाँ थक के छाँव ढूँढूंगा
तुम आँचल लहराये मिलोगी
तुम जहाँ तनहा महसूस करोगी
मैं पास तुम्हारे ठहरूंगा

मैं जब जब तुम्हे पुकारूँगा
तुम मेरे करीब कहीं होगी
तुम जब हाथ बढ़ाओगी
मैं बाहें फैलाये मिलूंगा

पर ये भी तो मुमकिन है ना
कि इस वादे की उमर ना हो
जो मैंने तुमने सोचा है
उस सोच का कोई असर ना हो

और यूँ ही बीत जाएँ
ये पल इस इंतज़ार में
कि इक वादा था किसी का
जो पूरा होने की आस में
बस... दफन हो गया।

- 24 December 2015

फिर कुछ लिखने बैठा हूँ

फिर कुछ लिखने बैठा हूँ
कुछ ऐसा जो बिक जाए
अपना कोई सपना जो
दूजी आँखों को दिख जाए

जिसके माने समझाने में
लफ्ज़ मेरे कुर्बान ना हों
काफी जिसका ज़िक्र ही हो बस
और कोई पहचान ना हो

मैं बेसुध हूँ कलम को थामे
कागज़ शायद कुछ लिख जाए

कुछ कह डालूँ ऐसा कि
बरसों तक दोहराएँ सब
बोल मेरे पर, गीत सभी का
अपनी धुन में गायें सब

चला चले ख़्वाबों का मेला
इक आये जो इक जाए

- Manasvi
2nd Nov 2015