Thursday, June 9, 2016

ख्वाबों से यारी हुई तो

ख्वाबों से यारी हुई तो
नींदे रूठ गयी हैं
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है

पहले नींद नहीं आई
कि कल क्या होगा जाने
फिर सोना चाहा तो
सपने आ बैठे सिरहाने
दबे पाँव आके सच्चाई
उम्मीदें लूट गयी है 
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है 

पहले रिश्तों फिर किश्तों
की खातिर दौड़े भागे
दिन दिन भर मीलों चले
कितनी रातों जागे
वादे निभाये औरों से 
खुद को दी कसमें टूट गयी हैं 
पल में सो जाने की आदत
कब की छूट गयी है

Manasvi
25th May 2016

तुम मेरी आँखों पे रख दो

तुम मेरी आँखों पे रख दो
थोड़ी आँच हथेली की
मैं भी सपने जला के देखूँ
कितना रंग बदलता है

क्या फिर मन उन्ही अरमानों की
राह में खोना चाहेगा?
फिर माँगेगा दुआ वही,
उसी चाँद के पीछे भागेगा?
क्या उसी झूठे वादे से
अब भी ये बहलता है?

हो सकता है कुछ ना बदले
सपना झुलसे पर रहे वही
आँसू बन थोड़ा सा पसीजे
पर आँखों से बहे नही
कब किस साँचे में ढल जाए
सपना रोज़ पिघलता है

- मनस्वी
25 april 2016

पहचान हो नयी

पहचान हो नयी
पर शोहरत वही मिले
दस्तखत वही रहें
पर नाम बदल जाए

कुछ अजनबी भी हों
कुछ अपने साथ रहें
बेमानी बातों में
कई शाम निकल जाए

पता नया भले हो
पर डाकिया पुराना
जो मेरे नाम ख़त हो
मुझ तक पहुँच जाए

शर्तों के साथ माँगी
पर फिर भी ख्वाहिशें हैं
जो थोड़ा लड़खड़ाउं
तो वक़्त सम्हल जाए

- Manasvi 18th March 2016

एक बादल

बस यूँ ही बरस के गुज़र गया
एक बादल इधर से किधर गया

दो बूँदें जाने कहाँ गिरी?
जाने किस मिटटी की बांछें खिली?
जाने किस दिल की प्यास बुझी?
बिन मौसम देखो आया वो
जो वादा कर के था मुकर गया

तुम लौट के आखिर आये क्यों?
क्या अपना कुछ यहाँ भूले हो?
या भटके हो किसी राही सा?
कुछ भी हो, हम तो खुश हैं कि
एक पल सुबह का संवर गया

- Manasvi 4th March 2016 (It rained today)

चलो एक वादा कर लें...

चलो एक वादा कर लें...

मैं जहाँ थक के छाँव ढूँढूंगा
तुम आँचल लहराये मिलोगी
तुम जहाँ तनहा महसूस करोगी
मैं पास तुम्हारे ठहरूंगा

मैं जब जब तुम्हे पुकारूँगा
तुम मेरे करीब कहीं होगी
तुम जब हाथ बढ़ाओगी
मैं बाहें फैलाये मिलूंगा

पर ये भी तो मुमकिन है ना
कि इस वादे की उमर ना हो
जो मैंने तुमने सोचा है
उस सोच का कोई असर ना हो

और यूँ ही बीत जाएँ
ये पल इस इंतज़ार में
कि इक वादा था किसी का
जो पूरा होने की आस में
बस... दफन हो गया।

- 24 December 2015

फिर कुछ लिखने बैठा हूँ

फिर कुछ लिखने बैठा हूँ
कुछ ऐसा जो बिक जाए
अपना कोई सपना जो
दूजी आँखों को दिख जाए

जिसके माने समझाने में
लफ्ज़ मेरे कुर्बान ना हों
काफी जिसका ज़िक्र ही हो बस
और कोई पहचान ना हो

मैं बेसुध हूँ कलम को थामे
कागज़ शायद कुछ लिख जाए

कुछ कह डालूँ ऐसा कि
बरसों तक दोहराएँ सब
बोल मेरे पर, गीत सभी का
अपनी धुन में गायें सब

चला चले ख़्वाबों का मेला
इक आये जो इक जाए

- Manasvi
2nd Nov 2015